Kaisi Jagah Hai

कैसी जगह है।

बड़ी विचित्र जगह है यह,
कुछ समझ आता नहीं,
क्या करूँ क्या न करूँ ,
कुछ भी तो है भाता नहीं,

कोई कहीं से आ गया,
कोई कहाँ गया यहाँ,
उलझे हुए हैं सभी,
सुलझा कोई पाता नहीं,

इस तरह खड़े हैं सब,
हशर का जैसे मैदान हो,
फैसला करवा के भी,
बची न उनकी जान हो,

है तड़प इतनी सी बस,
मै भी हूँ शामिल भीड़ में,
कर गुज़रने थे जिसे,
पार नदिया और पहाड़ थे,

रास्ता दिखलादूं अगर,
कोई भटका जो मिले मुझे,
मंज़िल मिलेगी मुझे भी,
फिर ये रहे चीर के।

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